ग़ज़ल – Songs of Ghazal (1964)


फ़िल्म: ग़ज़ल / Ghazal (1964)
गायक/गायिका: आशा भोंसले
संगीतकार: मदन मोहन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
अदाकार: मीना कुमारी, रहमान, सुनील दत्त

अदा क़ातिल नज़र बर्क़-ए-बला
यूँ भी है और यूँ भी
बला
यूँ भी है और यूँ भी
मोहब्बत करने वालों की क़ज़ा
यूँ भी है और यूँ भी
क़ज़ा
यूँ भी है और यूँ भी



(कभी चिलमन उठा देना
कभी चिलमन गिरा देना) – 2
कभी चिलमन गिरा देना
सितमगर नाज़नीनों की अदा
यूँ भी है और यूँ भी
अदा
यूँ भी है और यूँ भी



(हमें चाहा तो क्यूँ चाहा
हमें भूले तो क्यूँ भूले) – 2
हमें भूले तो क्यूँ भूले – 2
हाय
सज़ा हम क्यूँ न दे उनकी ख़ता
यूँ भी है और यूँ भी
(ख़ता
यूँ भी है और यूँ भी) – 2

अदा क़ातिल नज़र बर्क़-ए-बला
यूँ भी है यूँ भी बला
यूँ भी है और यूँ भी


फ़िल्म: ग़ज़ल / Ghazal (1964)
गायक/गायिका: मोहम्मद रफ़ी
संगीतकार: मदन मोहन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
अदाकार: सुनील दत्त, मीना कुमारी

दिल खुश है आज उनसे मुलाक़ात हो गयी
गो दूर ही से बात हुई बात हो गयी

उनसे हमारा कोई त’आल्लुक़ तो बन गया
बिगड़े भी वो अगर तो बड़ी बात हो गयी

धड़कन बढ़ी तो साँस की खुशबू बिखर गयी
आँचल उड़ा तो रंग की बरसात हो गयी

जी चाहता है मान भी लें, अब ख़ुदा को हम
जिसका यकीं न था वो क़रामात हो गयी


फ़िल्म: ग़ज़ल / Ghazal (1964)
गायक/गायिका: मोहम्मद रफ़ी
संगीतकार: मदन मोहन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
अदाकार: मीना कुमारी, रहमान, सुनील दत्त

इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ
ये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ

हुस्न और हुस्न का हर नाज़ है पर्दे में अभी
अपनी नज़रों की शिकायात किसे पेश करूँ

तेरी आवाज़ के जादू ने जगाया है जिन्हें
वो तस्सव्वुर, वो ख़यालात किसे पेश करूँ

ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल, ऐ मेरी ईमान-ए-ग़ज़ल
अब सिवा तेरे ये नग़मात किसे पेश करूँ

कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ


फ़िल्म: ग़ज़ल / Ghazal (1964)
गायक/गायिका: मोहम्मद रफ़ी, सुमन कल्याणपुर
संगीतकार: मदन मोहन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
अदाकार: सुनील दत्त, मीना कुमारी, रहमान

मुझे ये फूल न दे तुजह्को दिलबरी की क़सम
ये कुछ नहीं हैं तेरी सादगी की क़सम

नज़र हसीं है तो जलवे हसीन लगते हैं
मैं कुछ नहीं हूँ मुझे मेरी हुस्नगी की क़सम

तू एक साज़ है छेड़ा नहीं किसी ने जिसे
तेरे बदन में छुपी नर्म रागिनी की क़सम

ये रागिनी तेरे दिल में है मेरे तन में नहीं
परखने वाले मुझे तेरी सादगी की क़सम

ग़ज़ल का नाज़ है तू नज़्म का शबाब है तू
यकीन कर मुझे मेरी ही शायरी की क़सम


फ़िल्म: ग़ज़ल / Ghazal (1964)
गायक/गायिका: लता मंगेशकर
संगीतकार: मदन मोहन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
अदाकार: सुनील दत्त, मीना कुमारी

नग़मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूँ
ये छलकते हुए जज़बात किसे पेश करूँ

शोख़ आँखों के उजालों को लुटाऊं किस पर
मस्त ज़ुल्फ़ों की सियह रात किसे पेश करूँ

गर्म सांसों में छिपे राज़ बताऊँ किसको
नर्म होठों में दबी बात किसे पेश करूँ

कोइ हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारत किसे पेश करूँ


फ़िल्म: ग़ज़ल / Ghazal (1964)
गायक/गायिका: मोहम्मद रफ़ी
संगीतकार: मदन मोहन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
अदाकार: सुनील दत्त, मीना कुमारी

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ

मैने जज़बात निभाए हैं उसूलों की जगह – 2
अपने अरमान पिरो लाया हूँ फूलों की जगह
तेरे सेहरे की…
तेरे सेहरे की ये सौगात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ

ये मेरे शेर मेरे आखिरी नज़राने हैं – 2
मैं उन अपनों मैं हूँ जो आज से बेगाने हैं
बेत-आ-लुख़ सी मुलाकात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ

सुर्ख जोड़े की तबोताब मुबारक हो तुझे – 2
तेरी आँखों का नया ख़्वाब मुबारक हो तुझे
ये मेरी ख़्वाहिश ये ख़यालात किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ

कौन कहता है चाहत पे सभी का हक़ है – 2
तू जिसे चाहे तेरा प्यार उसी का हक़ है
मुझसे कह दे…
मुझसे कह दे मैं तेरा हाथ किसे पेश करूँ
ये मुरादों की हंसीं रात किसे पेश करूँ, किसे पेश करूँ

रंग और नूर की…


फ़िल्म: ग़ज़ल / Ghazal (1964)
गायक/गायिका: मोहम्मद रफ़ी
संगीतकार: मदन मोहन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
अदाकार: सुनील दत्त, मीना कुमारी

ताज तेरे लिये इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही
तुमको इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही

मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझ से

बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मानी
सब्त जिस राह पे हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मानी

मेरी महबूब पस-ए-पदर्आ-ए-तश्हीर-ए-वफ़ा
तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुदर्आ शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक मकानों को तो देखा होता

अनगिनत लोगों ने दुनिया में मुहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के
लेकिन उन के लिये तश्हीर का सामान नहीं
क्यों के वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे

ये इमारात-ओ-मक़ाबिर ये फ़सीलें, ये हिसार
मुतल-क़ुल्हुक्म शहं_शाहों की अज़मत के सुतूँ
दामन-ए-दहर पे उस रंग की गुलकारी है
जिस में शामिल है तेरे और मेरे अजदाद का ख़्हूँ

मेरी महबूब! उन्हें भी तो मुहब्बत होगी
जिनकी सन्नाई ने बख़्ह्शी है इसे शक्ल-ए-जमील
उन के प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नमूद
आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़ंदील

ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़
इक शहनशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक

मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझसे


फ़िल्म: ग़ज़ल / Ghazal (1964)
गायक/गायिका: लता मंगेशकर, मीनू पुरुषोत्तम
संगीतकार: मदन मोहन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
अदाकार: सुनील दत्त, मीना कुमारी, रहमान

उन से नज़रें मिली और हिजाब आ गया
ज़िंदगी में हसीन इन्क़िलाब आ गया

बेखबर थे उमर के तक़ाज़ों से हम
हमको मालूम न था ऐसे भी दिन आयेंगे
आइना देखे तो आप अपने से शरमायेंगे
आज जाना कि सच मुच शबाब आ गया

आँख झुकती है क्यों साँस रुकती है क्यों
इन सवालों क खुद से जवाब आ गया

दिल के आने को हम किस तरह रोकते
जिसपे आना था ख़ाना खराब आ गया

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