सिमटी हुई ये घड़ियाँ – Simti Hui Ye Ghadiyan


फ़िल्म – चंबल की कसम (1979)
गायक/गायिका – मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर
संगीतकार – खय्याम
गीतकार – साहिर लुधियानवी
अदाकार – राज कुमार, मौसमी चटर्जी


सिमटी हुई ये घड़ियाँ
फिर से न बिखर जायेँ – 2
इस रात में जी लें हम
इस रात में मर जायेँ
सिमटी हुई ये घड़ियाँ

अब सुबहा न आ पाये
आओ ये दुआ माँगें
इस रात के हर पल से
रातें ही उभर जायेँ
सिमटी हुई ये घड़ियाँ

दुनिया की निगाहें अब
हम तक न पहुँच पायेँ
तारों में बसें चलकर
धरती पे उतर जायेँ
सिमटी हुई ये घड़ियाँ

( हालात के तीरों से
छलनी हैं बदन अपने ) – 2
पास आओ के सीनों के
कुछ ज़ख़्म तो भर जायेँ – 2
सिमटी हुई ये घड़ियाँ

आगे भी अन्धेरा है
पीछे भी अन्धेरा है
अपनी हैं वोही साँसें
जो साथ गुज़र जायेँ – 2
सिमटी हुई ये घड़ियाँ

( बिछड़ी हुई रूहों का
ये मेल सुहाना है ) – 2
इस मेल का कुछ अहसाँ
जिसमों पे भी कर जायेँ
सिमटी हुई ये घड़ियाँ

तरसे हुये जज़बों को
अब और न तरसाओ
तुम शाने पे सर रख दो
हम बाँहों में भर जायेँ – 2
सिमटी हुई ये घड़ियाँ

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